Friday, June 18, 2021

...देखो ...

लबों को दाँत से दबाना हुस्न-ए-अदा होगा,
उसी  अदा से कभी आँसू थाम कर देखो !

मिल कर डूबने का लुत्फ़ दरिया होगा,  
फिर भी दूर किनारो पर साथ चल के देखो !

नज़र पर अपनी उससे गुमान बहुत होगा,
क्यों संग गुलाब होते है काँटे, सोच कर देखो !

इंतज़ार ऐसा कोई नहीं जो खत्म न होगा,
ज़मीनी या आसमानी, ये अलग बात है देखो !

-कबीर (तुषार)

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...की है !

तन्हाई चाँद की इतनी भी तन्हा नहीं,
कितने शायरों कैसे उनसे दोस्ती की है !

बहार देखोगे रखी हुई तुम पलकों पर,
खिज़ा से पर दीवानो ने वफ़ा की है !

सो रहा है सुकून के दायरों में कोई,
रात जाग माँ  ने कोई दुआ की है !

धीरे धीरे बढ़ो और देखो पहुँच जाओगे,
दुनिया भी खुदा ने कहाँ एक दिन में पूरी की है !

बहुत सोच के लिखो जो चाहते हो पढ़ना,
इतिहास ने पहले ही बहुत गलतियाँ की है !

कितनी बड़ी कतार है मंदिरो के बाहर,
वासना की देखो सब ने उपासना की है 
-कबीर (तुषार)
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...याद ...

आईना कहता कि  , वक़्त बदल गया है,
पर याद है कम्बख्त बूढ़ी नहीं होती !
-कबीर (तुषार)

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रोया नहीं उस रात...

मैं रोया नहीं उस रात,
बस सोया नहीं उस रात,
जाने कैसे खुद से मिला उस रात !

कहता रहा कितनी बात,
सुनता रहा अपनी  बात,
कुछ दूर कुछ पास हुआ उस रात !

सोचा नहीं कुछ उस रात,
कुछ अलग था  नहीं उस रात,
फिर भी चाँद से तारा हुआ उस रात !
-कबीर (तुषार)

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मैं फिरो वृंदावन धाम !

अनेक नाम जग में , मेरो तो  गिरिधर श्याम ,
सब ढूंढे जग को , रे  माई , मैं  फिरो वृंदावन धाम !
 रे  माई , मैं  फिरो वृंदावन धाम !  

मोती चमके, सोना चमके, चमके हीरा पन्ना ,
कुछ न दमके , दमके हैं जैसे मेरो  हरी नाम !
रे  माई,  दमके हैं जैसे मेरो  हरी नाम !

ना मैं मीरा, ना मैं राधा, ना 'कबीर ' सा ज्ञानी;
तृष्णा मेरी बस देखे मोहन, दूजो न कोई काम ! 
रे  माई,  दूजो न कोई काम !

दिन गुज़रे, रात बीते, बीते जाए जीवन,
क्यों बटोरो मैं कुछ, अगर मिल जाए कृष्ण-राम !
रे  माई,  अगर मिल जाए कृष्ण-राम

-कबीर (तुषार)
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Thursday, December 29, 2016

...शायद बारिश हो रही है...


उस घर से निकल भाग कर इस दरवाज़े तक आ गया हूँ...
भीगा है दरवाज़ा , शायद बारिश हो रही है ...
यहाँ नयी जगह कोई खिड़की नहीं दिखती
है तो बस आखें , जो बंद हो आज भी उस घर तक पहुच जाती है
खुली तो कुछ टपक गया ...एक माजी शायद ...
या ...फिर पता नहीं , शायद बारिश हो रही है...
बड़ी सावली सी छत , सीडियों पे  पर आ बैठी है
और एक में खड़ा हूँ , उस बदल के साथ ..वही ..
कुछ साफ़ दिखता नहीं...चश्मे पे ओस  है ..
या...फिर पता नहीं...शायद बारिश हो रही है ...
वो कुर्सी के आगे रखी है चाय, पकोडो कि खुशबू के साथ ..
रसोई में पर कोई नहीं है , बस हवा कुछ सिली है
या ...फिर पता नहीं...शायद बारिश हो रही है ...
-कबीर
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जितने भी तय करते गए बढते गए यह फासले ...
मिलो से दिन छोड़ आये , सालो से रात लेके चले - गुलज़ार 

Wednesday, November 30, 2016

...था...


आज फिर बरस गया
आज फिर भीग गया
कागज़ सा एक खवाब था ...

आज फिर कह गया
आज फिर सह गया
पत्थर सा एक आदम था...

आज फिर हंस गया
आज फिर बह गया
आईने  सा एक चेहरा था...

आज फिर रुक गया
आज फिर ठहर गया
सोच सा एक दर्द था ...

आज फिर मिल गया
आज फिर खिल गया
ओस सा रिश्ता था ...
-तुषार
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...आइना ...


बक्श कर गुनाह मेरे, चला गया सुकून में ...
पर घर पर आपना आइना एक छोड़ गया है ...
(This may need completion )
-तुषार 

...तलाश ...


कई रातों से लिखा नहीं कुछ,
दिन कई जैसे जोड़ रहा हूँ ,
रिश्ते जाने बस छूट गए है , 
या मैं अनजाने पीछे रह गया हूँ .
वो क्या था क्या है पिघलता सा ,
सच और झूठ मैं ढूँढ रहा हूँ ,
मैं और मैं कि तस्वीर को ले कर , 
अपना सा वो आइना दूंध रहा हूँ;
-तुषार

 

...साँस..याद


साँसो की डोर से बंधा सा सब… 
छोड़ दी वो साँस छोड़ दिए बंधन सभी .… 
पर हम तो अभी जी है रहे 
बंधे है साँसों से अपनी अभी.… 
सो जोड़ लिया इन साँसों को तुम्हारी यादो से अब…
-तुषार 


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...सफर ...


हर आगाज़ को अंजाम की चाह  तो नहीं ,
सफर हमसफ़र रहनुमा से है , मंज़िलों से नहीं 

मिलते है बिछड़ते है, बिछड़ते है मिलते है,
ज़िन्दगी  के मौसम के यह कुछ अंदाज़ तो नहीं,

बंद कर आँखो  को, पलो में  सदिया बाँध लेते है,
याद किसी के वक़्त की मोहताज़ तो नहीं 

तुम हो, हम है , आज यहाँ कल कहीं ,
यह पलछिन फिर होगे , रास्ते बदले है जज़्बात नहीं 
-तुषार

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...लम्हे ...


हर पल अपने हिस्से की दर्द या ख़ुशी जी  लेता है
फिर ..
लम्हे बीत  जाते है, एहसास गुज़र जाते है ..
-तुषार 

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...पल ...


जब आँखों में बसे चेहरे धुंधले हो जाये
जब मन के किस्से बस कही गम हो जाये
जब सपने हक़ीक़त से मिल सहम से जाये
तब रात के आलम में सब चाँद हो जाये
जब कदम रास्तो से बोझिल हो जाये
जब रौशनी सायो से गुम हो जाये
जब आईने का अक्श उदू (दुश्मन) हो जाये
तब जब तन्हाई भिखरी बारिश हो जाये
जब तब के झूले पे जब वक़्त सो जाये
तब भी मेरा हर पल तेरी शमा हो जाये
-तुषार 

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...ख़ज़ाने...


अगर एक दर्द से दूसरा कम  हो जाता
ये सफर हर साथी का हमसफ़र हो जाता
बटोरते रहे गमो के ख़ज़ाने को ए 'कबीर'
कोई तो ये दौलत छीन ले जाता
-तुषार

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...अपील ...


अज़ीब कशमकष है...
दिल भरा है, पर सब खाली...
कोई हैरानी नही न कोई दिवानगी...
दर्द छूट गया खुशी बीत गई...
रास्ता ठहरा है हम भागते कही....
कोई बस कर दे बदं पलक आके...
दुशमन न हो दोस्त ही सही..
-तुषार

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...बदल जायेगा

बहुत सर्दी है अंदर
खुद को खुद में समेत लिया है
कोई चादर नहीं कोई ओढ़ना नहीं
बहुत  ठण्ड है अजीब चुभती सी।..
चीखती सी खामोश सफेदी
....
काश कोई नरम हाथ आके थाम  ले मेरी
सुन्न  हथेली ...
कह दे
यह मौसम भी तो बदल जायेगा
-तुषार

...चाहता हूं ...

आज बहूत रोना चाहता हूं
घर ढूंढ रहा हो माकन से जाना चाहता हूं
अपनों से दर्द छुपा लेता हूँ
बेगानो से जुदा रहना चाहता हूँ
कहते है ज़िन्दगी मेरी है , पर रस्ते नहीं
इन राहो से बस अब गुज़र जाना चाहता हूं
-तुषार

Sunday, July 07, 2013

यथार्थ

यथार्थ से मिलके क्या पायेगा तू ,
ज़िन्दगी से भाग के कहाँ जायेगा तू ,
यह पल  अगर तेरा कर्म है तो पीले इसे ,
अगर नहीं तो भी जी ले इसे ,
पानी यह आंसू है या मोती ?
यह तो वक़्त की रफ़्तार के साथ ही बस जान  पायेगा तू
-तुषार 


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Monday, June 18, 2012

तलाश ...





कई रातों से लिखा नहीं कुछ,
दिन कई जैसे जोड़ रहा हूँ ,
रिश्ते जाने बस छूट गए है,
या मैं अनजाने पीछे रह गया हूँ .

वो क्या था क्या है पिघलता सा,
सच और झूठ मैं ढूँढ रहा हूँ ,
मैं और मैं कि तस्वीर को ले कर,
अपना सा वो आइना ढूँढ रहा हूँ;

भाग रहा था वो भी , शाम वही मिल जाता था,
बस उस बत्ति का मिलना था, कार से दिख जाता था,
कहाँ जाता था कहाँ से आता, पुछा नहीं कभी,
उलझा हूँ इतना , जाने किस तलाश को दूंध रहा हूँ
-तुषार

Friday, February 03, 2012

कई बार ...

आखों से अपनी कई बार देखा है ,
कई बार
उठ कर चलते हुए , गिरकर उसे
उस रास्ते पर चलते उसे
इस रास्ते पर ठहर सुस्ताते हुए
हाफ्ते थकते रुकते , कई बार
कई बार , भागते हुए
देखा है , अपनी ही आखों से ,
कई बार ....
सफ़र है या मंजिल
पड़ाव थे या जहन से गिरे पत्ते ...
सब को पीछे छोड़ते हुए
कभी बारिश में भीगते खड़े हुए
कई बार ...देखा है ...बस ऐसे ही...कई बार ...
और आज ...
देख रहा हू, पर कह नहीं सकता
अंत है या आगाज़ , किसी या उसी सफ़र का
उसे अपनों के द्वारा जलाते हुए ...
देखा है ...
कई बार...पर आज ..शायद ...आखिर बार ...जलते जलाते देखा है ...
-तुषार