Friday, June 18, 2021

अभी बाकी है !

तू  जाके भी नहीं गया ,
शायद कोई मौत अभी बाकी है ,
कितनी यादें कितनी उम्मीदें,
बहुत कुछ दफनाना अभी बाकी है !

दीवारों के रंग बदल दिए,
तस्वीरों  से आईने पोछ दिए,
जिस गली में ठहरे खड़े है,
उस गली से गुज़ारना अभी बाकी है !

बातों में वो जो चेहरे है,
गीतों से जुड़ी जो बातें है,
जो फ़क़त कभी लिखा नहीं ,
वो सब मिटाना अभी बाकी है !

वो जलते-२ भुझ भी गया,
आसमां सा वक़्त रुक भी गया,
बहुत कुछ धीरे-२  बहा दिया ,
बस राख बहानी  अभी बाकी है!

-कबीर (तुषार)
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एक इंसान हूँ मैं ?

विचित्रता के सत्य का एक प्रमाण हूँ मैं ,
खुदगर्ज़ समाज का पालक, एक इंसान हूँ मैं !

कैद कर रखी है कई जान पिंजरों में,
खुद की स्वतंत्रता के लिए चीखता रहा हूँ मैं !

कितना कुछ बटोर लिया छोड़ जाने के लिए,
आगे पीढ़ी के खाने में जहर घोलता रहा हूँ मैं !

जंगल से गाँव , गाँव से शहर ; लम्बा है सफर,
बर्फ पिघला, अपनी जीत की गर्मी में जल रहा हूँ मैं ! 

राशन तोलता , रिश्ते नापता; हर कुछ आँकता ,
आदम क्या , भगवान का  अनुक्रम रखता  रहा हूँ मैं !

-कबीर (तुषार)

ज़िन्दगी ...

बूँद बूँद कर गिरती रही भरती रही,
ज़िन्दगी पूरी भी हुई और खाली  भी रही !
-कबीर(तुषार) 

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गुमनामी

मैं ऐसे गुमनामी में मशहूर हो जाओ ,
अपने ही  किसी शेर को सुन दाद दे जाओ !
-कबीर (तुषार)

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ढल रहा ...

न चाँद आसमाँ है , न सूरज ढल रहा !
वक़्त रुका ज़माने से , ज़माना चल रहा !!

कितने मौसम साथ बीते साथ बिताये !
तेरी याद के पन्नो में मेरा ज़िक्र न रहा !!

मन सोचता नहीं, दिल कुछ कहता नहीं !!
कुछ खोया नहीं मैं बस खोया-खोया रहा !!

ढूंढता रहा उससे मंदिर-मस्जिद की भीड़ में !
वो जो बच्चों के साथ बाहर भूखा बैठा रहा !!

आज चार दीवारों में उन्मुक्ता से कैद हूँ !
सब से मिलके भी मेरा अपना यथार्थ रहा !!
-कबीर (तुषार )

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वादा...


दी थी जो  किताब , उसका उधार रह गया,
पन्नो में कैद था वादा, बस वादा ही रह गया !
-कबीर (तुषार)

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साँस ...चाँद ...

साँस-साँस कर देखो दिन गुज़र जाता है,
कुछ आह है होती  फिर चाँद बदल जाता है !
-कबीर (तुषार)

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वो साथ गुज़ारी शामों के ...

वो साथ गुज़ारी शामों के  ,
कुछ कदम तुमने रखे ,
कुछ राह मैंने थामी ,
वही थे पल , एक साथ गुजरे ,
कुछ याद तुमने चुनली ,
कुछ याद मैंने पाली ,
सालो बाद वही शाम है ,
कुछ लम्हे तुमको हँसाती ,
कुछ बातें हमको जगाती !
-कबीर (तुषार)

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सैलाब

खड़ा हूँ अकेला दरख़्त सा देखो,
कोई छू ले तो मैं भी सैलाब हो जाऊ !
-कबीर (तुषार)
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देखो मुझे बड़ा होना अच्छा नहीं लगता

देखो मुझे बड़ा होना अच्छा नहीं लगता   

चलता हूँ पीछे-२ , हाथ नहीं पकड़ता,
गुल्लक में टॉफ़ी के पैसे नहीं भरता !
 
२ बजे आज भी स्कूल की घंटी हूँ सुनता ,
साइकिल पर अब मैं घर नहीं पहुँचता !

दादा-दादी , नाना-नानी की कहानी नहीं सुनता,
अपने सपनो को अब बस यूँ ही नहीं कहता !

काश 'कबीर' बचपन सबका बचपन ही रहता,
शायद  किसी को  बड़ा होना अच्छा नहीं लगता !
-कबीर(तुषार)
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न करो ...

मुझसे मिल मुझे नापने की कोशिश न करो, 
अंदर समुन्दर है, उसकी यूँ तौहीन न करो ! 

ज़िन्दगी मिल जाएगी एक दिन मौत से अपनी,
दिन रात की भाग दौड़ से उसे यूँ दीवाना न करो !

आदम का आदम से है ज़रूरतो का रिश्ता ,
कुछ कर दान, अपने होने का भ्रम न करो !

सर ऊंचा है तुम्हारा कि आसमाँ गिरता नहीं,  
धुआँ -धुआँ  कर उसे गलने को मजबूर न करो 

-कबीर (तुषार)  
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बिना ख़बर...

शक्ल देख अपनी जीते-जी ऐ 'कबीर ',
कही सूरत बदल न जाये बिना ख़बर। 

ख्याल में खो गए, हो गए मदहोश,
अस्ल छूट गया कही  बिना ख़बर।  

वो दोस्तों के साथ हँसते हर कदम,
बईमान बन गया आशिक़  बिना ख़बर।  

इंतज़ार मौत और दस्तक पर बैठे बैठे ,
ज़िन्दगी हुई धुआँ यूही  बिना ख़बर।  

पा लिया ताज-औ-तख़्त ए साहिब ,
ज़मीनी हुआ 'कबीर' फिर भी  बिना ख़बर।  
-कबीर (तुषार)      
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देता हूँ !

एक धुंधुलाये अक्स सा मुस्कुरा देता हूँ ,
झूठ के दायरों में तुझे सच की आँच  देता हूँ !

ज़र्रे -ज़र्रे बूटे-बूटे  में ढूँढा किये दिल,
तुझे अपने नाम की वजह  देता हूँ ! 

वो भागते भूल गए चाँद से मिलना ,
ए मुसाफिर तुझे तारों की रात  देता हूँ ! 

मिल गए कभी जुदा हुए ए 'कबीर',
सपनो की बस कुछ ऐसे ताबीर  देता हूँ ! 

गिला नहीं , ढूंढा नहीं तुझे ए खुदा ,
मालिक तुझे माँ का नाम  देता हूँ ! 

राहगीर चलते गए।  तलाश में कई ,
तुझे तेरा सा रहगुज़र  देता हूँ ! 

-कबीर (तुषार)     
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...सराय ...

दिल तेरा 'कबीर' एक सराय ही तो है,
नामो से भरेगा और फिर तन्हा रह जायेगा !
-कबीर (तुषार)
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समाचार

समाचार कभी  सादाकार था,
आज सब हाहाकार है !
सोचता हूँ सुनते सुनते,
क्या करने कहने वाला  मेरी तरह  शर्मशार है ?

एक मौत  पर न जाने 
कितने घर बनते है ?
एक कपड़ा जो उतरा था,
उससे कितने लिबास सिलते है !

एक पेड़ लगाया छोटा सा,
देखो कितनी तस्वीर छपती है!
वो जला दिए जंगल सारे,
यहाँ इमारते बिकती है !

वो पीड़ित नहीं नमूना है,
उसे बेचना बनता है !
जो मारा गया कारखानों से  ,
इश्तिहार से छुपाना पड़ता है !

सोचता हूँ सुनते सुनते,
क्या करने कहने वाला भी शर्मशार है ?
-कबीर(तुषार)
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...ज़िन्दगी ...

मैं जागता रहा ज़िन्दगी के स्वागत  में ,
वो सपनो में आने का इंतज़ार करती रही !
-कबीर (तुषार)

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दी है !

सोने के बेड़ियों से सजा के यूँ सजा दी है,
मुझे दायरों में उड़ने की कुछ यूँ हवा दी है !

होता था पैदा अनाज खेतो खलियानो में ,
वहाँ किसने उनको हवस की भूख दी है !

हाथ थाम लिया और फिर जाने ने दिया,
नेता ने जनता को वादों की बारिश दी है !

ऐसा नहीं कुछ तो अंतर होगा जो दीखता नहीं,
तभी तो माँ ने बेटो को रख , बेटी को विदाई दी है !
-कबीर (तुषार)

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...अज्ञानी ...ज्ञानी ...

अजब गजब खेले खेल, भौचक नहीं तो ज्ञानी,
खादी रेशम ओढ़ के घूमत देखो देह अज्ञानी !
-कबीर (तुषार)

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...बूँद ...

वो बूँद रहता तो होता आसमाँ ,
जो बरस गया तो ज़मीन हो गया !
-कबीर (तुषार)

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...हैरान ...

देख पीछे  'कबीर' बड़ा हैरान हो गया है ,
जानवर था कभी अब इंसान हो गया है ! 
-कबीर (तुषार )
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