Thursday, July 23, 2009
...देता हूँ
सब के लिए ख़ुद को भूला देता हूँ;
ज़र्रे-ज़र्रे बूटे में ढूँढा किए दिल,
तुझे अपने नाम की वजह देता हूँ;
वो भागते भूल गए चाँद से मिलना,
ए मुसाफिर तुझे तारो के रात देता हूँ;
मिल गए कभी जुदा हुए ए 'कबीर'
सपनो की कुछ ऐसे सच्चाई देता हूँ;
गिला नहीं, ढूँढा नहीं तुझे ए खुदा,
मालिक तुझे माँ का नाम देता हूँ;
राहगीर चलते गए, तलाश में कोई,
तुझे तेरा सा रहगुज़र देता हूँ;
-तुषार
Wednesday, July 08, 2009
ज़िन्दगी ...?
वो बहा नहीं, तो क्या उसका कोई नाम नहीं ?
वो लकीरें है हाथो में और कुछ भी तो नहीं ,
वो जिन्दगी, कहीं मौत का एक अंदाज़ तो नहीं ?
-कबीर
Friday, June 12, 2009
...खुशी...गम...
वो खुशी तेरी थी, तेरी हुई, चली गई,
वो अशक मेरे थे, बहे फिर ठहर गए;
अब क्यों खुशी को बुलाये जो हुई पराई?
क्यों गम को सताए जो है बस हमसाये ?
-तुषार
Wednesday, June 10, 2009
...गम...दिल ...
तू गया, तेरा गम भी एक दिन यूँ चला जाएगा,
कोई कहाँ रुका है जो यह मौसम ठहर जाएगा
वो बरसा तो दिल भी कहीं गीला भीगा हो जाएगा
वो सूख गया तो दिल भी बस पत्थर हो जाएगा .
-तुषार
Wednesday, June 03, 2009
ये रात अकेली लगती है ...
वो चाँद तन्हा जगता है ;
न कोई अपना मिलता है ,
न कोई पराया दीखता है ;
वो दिन मैं चेहरे लड़ते है ,
और रात में डर सा लगता है ;
वो कहीं बिछडा जाता है ,
यह हाथ खाली रहता है ;
वो ऊचे मकान में जीता है ,
कहीं घर खाली बैठा है ;
यह आसमान को छुता है ,
बस तारो से बातें करता है ;
वो सर्द ईमारत में हँसता है ,
मौसम से अछुता रहता है ;
वोह दिनभर भागता रहता है ,
और बस इंतज़ार में जीता है ;
वो रोज़ कुछ पाता है ,
और ख़ुद खोता लगता है ;
कहाँ अब ख़ुद से मिलता है ,
कहाँ ख़ुद को जानता है ;
कुछ अधूरे सपनो को रोता है ,
और ज़िन्दगी से शिकायत करता है ;
ये रात अकेली लगती है ,
वो चाँद तन्हा जगता है ;
-तुषार
Monday, June 01, 2009
अन्त ...शुरुवात...
वही शुरुवात जो उस अन्त के लिए जन्मी थी ...
Every end is a conclusion of a new start,
The start which commenced for that very end…
-Tushar
Friday, May 22, 2009
...पता ही नहीं
न गम न खुशी कुछ भी जैसे साथ नहीं,
फिर भी क्यों अकेले बैठे यू ही कहीं,
मुस्कुराती कभी नम है आखें , पता ही नहीं ...
-तुषार
...पता ...
"दिल में रह न सके किसी के", कहाँ हमने ," बस सोते है मकानों में" ।
-तुषार
...रिश्ता...
वो अल्फाज़ नहीं जो दिल से उतर जाए,
वो खामोशी नहीं जो दिल मैं बस जाए,
रिश्ता है वही, जो नम नज़र यूँ जान जाए,
गम है जो हसाए, या खुसी ही बस यूँ रुला जाए ।
-तुषार
पीला चाँद ...
Tuesday, May 19, 2009
...जाएगा...
बादल बरसा तो , एहसास बदल जाएगा,
सूखी धरती पे फिर फूल खिल जाएगा ।
गम के दाग तो देख चलते सूख जायेगे ,
उसका नाम भी क्या दिल से भूल जाएगा।
वो रुके ठहरे और कहीं सो जाए , ऐ 'कबीर',
तू आया है तो बस तू चलता ही जाएगा ।
तू मांगे न मांगे , सोचे न सोचे, वो दुआ,
देख 'खुदा' काटो के साथ फूल भी दे जाएगा ।
दिल तेरा ज़िन्दगी की एक सराय ही तो है ,
नामो से भरेगा और फिर तनहा रह जाएगा ।
-तुषार
Monday, May 18, 2009
...पर...
न मेरा रहा, न ही हो सका पराया सा ,
पर जाना अब बादल क्यों बरसता है,
पर क्यों नहीं ये बादल ठहराता है ?
वो पत्ती सूख गई गुलदस्ते मैं,
वो ख़ुद न रहा, रहा बस कमरों मैं,
पर क्या कोई ऐसे ज़मीन से बिछडा है ?
पर क्या कुछ कही माँ से छूटा है ?
वो सपना आखों मैं ही रहा तो क्या ?
वो तस्वीर को तस्सुवर न मिला तो क्या ?
पर ज़िन्दगी की उससे एक चाह तो है ,
पर उससे मिलने, पाने ही राह तो है ।
वो रिश्ता तो है पर कुछ बदला सा है ,
वो मुस्कुरा के कुछ मचला तो है ,
पर चाह से पाना ही तो बस नहीं जीवन है ,
पर माना बदले रंगों मैं भी ज़िन्दगी होती है ।
-तुषार
...तेरे प्यार का ही तो है
वो चाँद हल्का पीला है ।
वो तेरी जुल्फ ही तो है ,
वो तेरा चेहरे का रूप ही तो है ।
वो हवा भीनी छू जाती है ,
वो बदली श्याम सी हो जाती है ।
वो तेरी हया सी हँसी ही तो है ,
वो तू शर्म से सिमटी सी तो है ।
वो पत्ती सुर्खसी मोतीहै ,
वो कोयल कुहुक जाती है ।
वो तेरे लबो की चोरी ही तो है ,
वो तेरी धड़कन की बोली ही तो है ।
वो रास्ता ढाका छाव सा है ,
वो मौसम प्यारा गाँव सा है ।
वो सफर तेरे साथ का ही तो है ,
वो घर तेरे प्यार का ही तो है ।
-तुषार
Tuesday, March 03, 2009
तब...अब
गली में आज भी जाते तो है
तब फूलो के चेहरे थे जिए
अब आंसू समेटे आते है
-कबीर
Friday, January 23, 2009
...है हम
अंजान बेखबर क्या पाया क्या खोते है हम
हर रिश्ता कुछ एहसासों का सिला ही तो है
कुछ लिखते कुछ मिटाते रहे है हम
वो आए मेरे यार फिर दर से विदा हुऐ भी
हर आहट से मिले, हर कदम से बिछडे है हम
हर एक रूप उसका बस इबादत है मेरी
कभी दूंढे कभी निहारते रहे है हम
-तुषार
Tuesday, January 20, 2009
do rah ki bas zindagi si...
kahin ruthi kahin manati si
kahin bheegi kahin hasti si
kahin dhadkan kahin khamoshi si
kahin mele kahin tanhahi si
kahin firaq kahin husn si
kahin gulab kahin chubhan si
-Chakresh & Tushar
...जीता है
यहाँ फिर लौटते अजब पशेमान है,
अपने यार कहाँ, बेगाने नाम सुनता है;
कुछ पत्ते भीगे कुछ मौसम पीला है,
वही जानी गलियाँ , बदला मकान लगता है;
'कबीर' शायद अभी बीत नहीं पाया है,
हर कोई बस दुनिया-ऐ-दस्तूर जीता है;
दिल मैं बहते सालो के लम्हे है,
आखों मैं अलग बस मंज़र दीखता है;
-तुषार
Friday, January 09, 2009
मोड़..
उस मोड़ पे मिले, इस मोड़ तक चले हमदम
ज़िन्दगी पा ली तेरे साथ से हर कदम !
२
उस मोड़ पे मिले, इस मोड़ तक चले हम
ज़िन्दगी की डगर मंजिल तू ए हमसफ़र
कभी बढे कभी रुके रह के कदम
तू साथ बस, चाहत और हम बेखबर ।
३
हर मोड़ मुढा है मंजिल-ऐ-जान के लिए,
बेखयाल के अदा-ऐ-पता बदल गया ।
-तुषार
Sunday, January 04, 2009
...बिना ख़बर
कहीं सूरत बदल जाए बिना ख़बर !
ख्याल में खो गये मदहोश,
अस्ल छूट गया कहीं बिना ख़बर !
वोः दोस्तों के साथ हसते हर कदम,
बेईमान बन गया आशिक बिना ख़बर!
इंतज़ार मौत दस्तक पर बैठे-बैठे ,
ज़िन्दगी उड़ा दी यूही बिना ख़बर;
कल गुजरने पे रुका सोया,
आज बस बह गया बिना ख़बर;
पा लिया ताज-ओ-तख्त ऐ साहिब,
ज़मीनी हुआ 'कबीर' बिना ख़बर;
-तुषार/कबीर
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