Sunday, July 07, 2013

यथार्थ

यथार्थ से मिलके क्या पायेगा तू ,
ज़िन्दगी से भाग के कहाँ जायेगा तू ,
यह पल  अगर तेरा कर्म है तो पीले इसे ,
अगर नहीं तो भी जी ले इसे ,
पानी यह आंसू है या मोती ?
यह तो वक़्त की रफ़्तार के साथ ही बस जान  पायेगा तू
-तुषार 


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My Shadow by Tushar Sharma- 'Kabir' is licensed under a Creative Commons Attribution 3.0 Unported License.
Based on a work at www.myshadewithshadow.blogspot.com.

Monday, June 18, 2012

तलाश ...





कई रातों से लिखा नहीं कुछ,
दिन कई जैसे जोड़ रहा हूँ ,
रिश्ते जाने बस छूट गए है,
या मैं अनजाने पीछे रह गया हूँ .

वो क्या था क्या है पिघलता सा,
सच और झूठ मैं ढूँढ रहा हूँ ,
मैं और मैं कि तस्वीर को ले कर,
अपना सा वो आइना ढूँढ रहा हूँ;

भाग रहा था वो भी , शाम वही मिल जाता था,
बस उस बत्ति का मिलना था, कार से दिख जाता था,
कहाँ जाता था कहाँ से आता, पुछा नहीं कभी,
उलझा हूँ इतना , जाने किस तलाश को दूंध रहा हूँ
-तुषार

Friday, February 03, 2012

कई बार ...

आखों से अपनी कई बार देखा है ,
कई बार
उठ कर चलते हुए , गिरकर उसे
उस रास्ते पर चलते उसे
इस रास्ते पर ठहर सुस्ताते हुए
हाफ्ते थकते रुकते , कई बार
कई बार , भागते हुए
देखा है , अपनी ही आखों से ,
कई बार ....
सफ़र है या मंजिल
पड़ाव थे या जहन से गिरे पत्ते ...
सब को पीछे छोड़ते हुए
कभी बारिश में भीगते खड़े हुए
कई बार ...देखा है ...बस ऐसे ही...कई बार ...
और आज ...
देख रहा हू, पर कह नहीं सकता
अंत है या आगाज़ , किसी या उसी सफ़र का
उसे अपनों के द्वारा जलाते हुए ...
देखा है ...
कई बार...पर आज ..शायद ...आखिर बार ...जलते जलाते देखा है ...
-तुषार

Monday, December 12, 2011

ज़िन्दगी को कई बार आखँ बंद कर देखा है हमने...

ज़िन्दगी को कई बार आखँ बंद कर देखा है हमने ...
कभी खुद के लिए कभी बस यूही कुछ कहा है हमने,

तलाश रहे थे सहारा बेसहारो की भरी नगरी में,
कई बार खुद को खुद से हारते देखा है हमने ;
ज़िन्दगी को कई बार आखँ बंद कर देखा है हमने...

चाह थी एक मामूली आराम की बस आम सी,
कभी थके खुद, पर उनको आराम देते देखा है हमने;
ज़िन्दगी को कई बार आखँ बंद कर देखा है हमने...

आज उनको देख जलन होती नहीं, खुशी भी नहीं,
कई सिलसिलो को गुजरते जाते देखा है हमने;
ज़िन्दगी को कई बार आखँ बंद कर देखा है हमने...
-तुषार

Monday, November 21, 2011

सपना...


हर राह अपनी है अगर मंजिल का पता नहीं,
वो ज़िन्दगी बस सपना है जिसे हकीक़त की हवा नहीं;

कई पल छाने कई लम्हे टटोले होंगे,
वो बीत गया क्या , जिसे याद की सजा नहीं;

लफ्ज़ तोले है कई बार ज़माने ने तेरे,
वो कहानी ही क्या, जिसे झूठ की परवाह नहीं;

एक ही घर से निकले सब राही , हमकदम नहीं,
मिलेंगे फिर,कोई ख्याल इंसान से जुदा तो नहीं;

-तुषार

Friday, October 21, 2011

...आँचल...

क्या माँ के आँचल को छू सकता हूँ...
कुछ थक सा गया हूँ , क्या माँ कि गोद में सो सकता हूँ...
कहते है बड़ा हूँ गया है अब 'कबीर' ...
पर क्या कुछ पल के लिए माँ का चंदा बन सकता हूँ ?
-तुषार

Wednesday, October 19, 2011

...घर...

क्या छुट गया पीछे , घर में, कौन देखे मुड के ?
कहीं थोड़ी सीलन , कहीं चोबे उतारी तस्वीरो के
कुछ दरवाज़े खुले , कमरों के, कुछ चेहरे खाली आइनों के
कुछ बाँध लिया पेटी में, कुछ पीछे रह सिक्के दादू के...
-तुषार

Tuesday, October 18, 2011

...आइना...

बक्श करे गुनाह मेरे , चला गया सुकून में...
पर घर पर अपना आइना एक, छोड़ गया है ...
-तुषार

Friday, July 29, 2011

???

वोह देखो हँसता है वोह देखो रोता है, वो दिनों को देखो जीता है,
वोह न रुकता है वो न थमता है, पर कभी वो थका भी दिखता है ...

जो मिला वो कभी चाह नहीं, जो चाहा वो कभी मिला नहीं,
मेरी ज़िन्दगी की किताब को जाने कौन लिखता है ...


मेरी दिल के आरजोयो में अब कहीं कोई नाम नहीं ,
जो थे वो कहीं मिट गए, नए अब मैं बस लिखता नहीं...

-तुषार


Wednesday, July 27, 2011

आज फिर ...था.....

आज फिर बरस गया
आज फिर भीग गया
कागज़ सा एक खवाब था ...

आज फिर कह गया
आज फिर सह गया
पत्थर सा एक आदम था...

आज फिर हंस गया
आज फिर बह गया
आईने सा एक चेहरा था...

आज फिर रुक गया
आज फिर ठहर गया
सोच सा एक दर्द था ...

आज फिर मिल गया
आज फिर खिल गया
ओस सा रिश्ता था ...
-तुषार

Tuesday, June 07, 2011

कहानी और सच...

दादा दादी की कहानी बड़ी प्यारी थी,
पर दादा-दादी ने बोला झूठ था मुझे,
न होती है परी, न होता है हातिम ...

कुछ मगर सचाई उन कहानी में भी थी,
शैतान से डर तब भी लगता था मुझे,
चाँद उनमे भी बस मुस्कुराता था हसीन...

ज़िन्दगी है ये और कहानी रही वोह थी,
वहां सुकून राजकुमारी, 'कबीर' यहाँ मिला मुझे,
सचाई के दिन, सपने की बातें फैली यही कहीं ...
-तुषार

Sunday, May 29, 2011

..दर्द..

सवाल अब कोई पूछे नहीं जाते तुझसे ,
ज़िन्दगी इस शर्त पर ही तो मिले है हमे;


कुछ था ही नहीं मेरा पास मेरे , जो तू ले गया ,
किस्मत शायद तेरी , खुदा ने बक्श दी थी हमे;


मुस्कराहट की रौशनी है लबो पे सबकी ,
दर्द रातों को ही तो बस जगाता है हमे;


कुछ रिश्ते बड़े महगे हुए ‘कबीर ’ तेरे ,
रोये वोह तो उनकी कीमत पता चली हमे ;


On valentine day rose killing :


गुलाब बिछड़े कई अपनों से , महकाए कई चेहरे ,
कुछ ऐसे ही खुद के लिए , ज़माने ने अपनाया है हमे


-तुषार

मेरे तीन प्यारो के लिए ...

पत्थर हुआ नहीं ,थोड़ी नमी शायद बाकी है ;
नन्ही हंसी आज भी कभी युही धुंधली हो जाती है ;


-तुषार



...अन्त

हर रहनुमा को छोड़ दीया खुद की बुलंदी के लिए,


आज तनहा कुछ ऐसे है की तन्हाई भी न मिले;


जिस शहर की रौनक से थे हम खेला कभी किये,


वोह बस्ती आज अनजान बेगानों सी है मिले ...


-तुषार

जज्बात ...


1. ”ऐसा नहीं की अपनी कोई कहानी नहीं
लफ्ज़ अपने बस बक्श दिए है हमने ”-

2. "ज़िन्दगी तुने बहूत कुछ दीया है हमे ,
हंसी हमारी शायद हमसे ही खो गयी है "

3. "तन्हाई की भी खुदा अजब रौनक है,
किसी की भी कहानी का हिस्सा नहीं हम,
सब चल रहे है सोचकर बस ये 'कबीर'
चाँद मिला तो सितारे खोने का क्या है गम"


-तुषार

Wednesday, July 21, 2010

...सपना...

क्या खलिश , पता नहीं क्या हैरानी फिरती है;
सपनो में हूँ रहता , ज़िन्दगी हकीक़त सी लगती है ,

खवाइश आसमान तक फैली है , धुंद ज़रा सी ठहरी है;
कहाँ बादल घुमड़े है , और कहाँ बूँद सी भिखरी है,

रास्ते चुप चाप राह पर चलते है , मंजिल पीछे बैठी है;
सुकून है कुछ दर्द का, कहीं बर्फ आग से पिघली है ,

कुछ किरने पानी पर सोती है , गुलाबी सी रंगीनी है,
चाँद अभी पका नहीं, चांदनी अभी बोनी है

-तुषार

Sunday, June 06, 2010

...सका

दर्द इतना है की कुछ लिख न सका ,
दोस्त कहाँ था तुझे कभी , आज कुछ कर/कह न सका ;

मुसाफिर हूँ , शहर या बस्ती नहीं ,
तू साथ चल न सका , में पास रुक न सका ;

हर पते से पुछा है पता ,
किसी दरवाज़े पे खुद से मिल न सका ;

पीपल वो मेरा रूठ गया , सूख गया ,
ज़िन्दगी से बड़ा कोई रिश्ता जी न सका ;

हारा हो , माना है , पर जुर्म बस इतना है ,
तकदीर का अपना बस कभी हो न सका ;
-तुषार

...तनहा...

किससे अपना दिल कहे हर कोई हैरान फिरता है
भीड़ है कितनी दुनिया में , पर हर पल तनहा मिलता है
-तुषार

तन्हाई

क्या सोचा था ज़िन्दगी इतनी अजनबी होगी
चाँद मिलेगा फिर भी रात तनहा होगी

इंतज़ार तेरा ज़माने से बगावत होगा
तुझसे वफ़ा , खुदा से बेवफाई होगी

ज़िन्दगी मेरी मेरे हाथों में ही तो है
लकीरों में दास्ताँ हर पल की छुपी होगी

क़र्ज़ उठाये है मुस्कराहट के बेहिसाब
कभी तो नज़र कोई कहीं हमकदम होगी

मुख़्तसर से रिश्ते और फलसफे -ए -ज़िन्दगी ,
कारवां से मिले फिर भी तन्हाई संग होगी
-तुषार

...होंगे

जाम लिए हाथ मैं कहो न ए दिल,
लफ्ज़ वो तेरे भी अनसुने होंगे ;

दिलो का खेल है और दस्तूर एक ,
तेरी ज़मीन पर चंद अशक ही होंगे ;

न हो बेपर्दा और न ही किताब ,
कुछ दर्द बहे तो बस लुत्फ़ होंगे ;

दे इजाज़त मोहबत करने की मुझे ,
मेरे गुनाह कई फिर तुझे बक्शने होंगे ;

तू भी परख मुझे , और मैं भी , मालिक ,
कभी तो तेरे लिए हम भी इंसान होंगे ;
/*This is a stolen but felt thought */

दे गए आराम कुछ पल बैठ कर ,
और कितने दोस्ती के क़र्ज़ होंगे ;
-तुषार