Friday, October 21, 2011

...आँचल...

क्या माँ के आँचल को छू सकता हूँ...
कुछ थक सा गया हूँ , क्या माँ कि गोद में सो सकता हूँ...
कहते है बड़ा हूँ गया है अब 'कबीर' ...
पर क्या कुछ पल के लिए माँ का चंदा बन सकता हूँ ?
-तुषार

Wednesday, October 19, 2011

...घर...

क्या छुट गया पीछे , घर में, कौन देखे मुड के ?
कहीं थोड़ी सीलन , कहीं चोबे उतारी तस्वीरो के
कुछ दरवाज़े खुले , कमरों के, कुछ चेहरे खाली आइनों के
कुछ बाँध लिया पेटी में, कुछ पीछे रह सिक्के दादू के...
-तुषार

Tuesday, October 18, 2011

...आइना...

बक्श करे गुनाह मेरे , चला गया सुकून में...
पर घर पर अपना आइना एक, छोड़ गया है ...
-तुषार

Friday, July 29, 2011

???

वोह देखो हँसता है वोह देखो रोता है, वो दिनों को देखो जीता है,
वोह न रुकता है वो न थमता है, पर कभी वो थका भी दिखता है ...

जो मिला वो कभी चाह नहीं, जो चाहा वो कभी मिला नहीं,
मेरी ज़िन्दगी की किताब को जाने कौन लिखता है ...


मेरी दिल के आरजोयो में अब कहीं कोई नाम नहीं ,
जो थे वो कहीं मिट गए, नए अब मैं बस लिखता नहीं...

-तुषार


Wednesday, July 27, 2011

आज फिर ...था.....

आज फिर बरस गया
आज फिर भीग गया
कागज़ सा एक खवाब था ...

आज फिर कह गया
आज फिर सह गया
पत्थर सा एक आदम था...

आज फिर हंस गया
आज फिर बह गया
आईने सा एक चेहरा था...

आज फिर रुक गया
आज फिर ठहर गया
सोच सा एक दर्द था ...

आज फिर मिल गया
आज फिर खिल गया
ओस सा रिश्ता था ...
-तुषार

Tuesday, June 07, 2011

कहानी और सच...

दादा दादी की कहानी बड़ी प्यारी थी,
पर दादा-दादी ने बोला झूठ था मुझे,
न होती है परी, न होता है हातिम ...

कुछ मगर सचाई उन कहानी में भी थी,
शैतान से डर तब भी लगता था मुझे,
चाँद उनमे भी बस मुस्कुराता था हसीन...

ज़िन्दगी है ये और कहानी रही वोह थी,
वहां सुकून राजकुमारी, 'कबीर' यहाँ मिला मुझे,
सचाई के दिन, सपने की बातें फैली यही कहीं ...
-तुषार

Sunday, May 29, 2011

..दर्द..

सवाल अब कोई पूछे नहीं जाते तुझसे ,
ज़िन्दगी इस शर्त पर ही तो मिले है हमे;


कुछ था ही नहीं मेरा पास मेरे , जो तू ले गया ,
किस्मत शायद तेरी , खुदा ने बक्श दी थी हमे;


मुस्कराहट की रौशनी है लबो पे सबकी ,
दर्द रातों को ही तो बस जगाता है हमे;


कुछ रिश्ते बड़े महगे हुए ‘कबीर ’ तेरे ,
रोये वोह तो उनकी कीमत पता चली हमे ;


On valentine day rose killing :


गुलाब बिछड़े कई अपनों से , महकाए कई चेहरे ,
कुछ ऐसे ही खुद के लिए , ज़माने ने अपनाया है हमे


-तुषार

मेरे तीन प्यारो के लिए ...

पत्थर हुआ नहीं ,थोड़ी नमी शायद बाकी है ;
नन्ही हंसी आज भी कभी युही धुंधली हो जाती है ;


-तुषार



...अन्त

हर रहनुमा को छोड़ दीया खुद की बुलंदी के लिए,


आज तनहा कुछ ऐसे है की तन्हाई भी न मिले;


जिस शहर की रौनक से थे हम खेला कभी किये,


वोह बस्ती आज अनजान बेगानों सी है मिले ...


-तुषार

जज्बात ...


1. ”ऐसा नहीं की अपनी कोई कहानी नहीं
लफ्ज़ अपने बस बक्श दिए है हमने ”-

2. "ज़िन्दगी तुने बहूत कुछ दीया है हमे ,
हंसी हमारी शायद हमसे ही खो गयी है "

3. "तन्हाई की भी खुदा अजब रौनक है,
किसी की भी कहानी का हिस्सा नहीं हम,
सब चल रहे है सोचकर बस ये 'कबीर'
चाँद मिला तो सितारे खोने का क्या है गम"


-तुषार

Wednesday, July 21, 2010

...सपना...

क्या खलिश , पता नहीं क्या हैरानी फिरती है;
सपनो में हूँ रहता , ज़िन्दगी हकीक़त सी लगती है ,

खवाइश आसमान तक फैली है , धुंद ज़रा सी ठहरी है;
कहाँ बादल घुमड़े है , और कहाँ बूँद सी भिखरी है,

रास्ते चुप चाप राह पर चलते है , मंजिल पीछे बैठी है;
सुकून है कुछ दर्द का, कहीं बर्फ आग से पिघली है ,

कुछ किरने पानी पर सोती है , गुलाबी सी रंगीनी है,
चाँद अभी पका नहीं, चांदनी अभी बोनी है

-तुषार

Sunday, June 06, 2010

...सका

दर्द इतना है की कुछ लिख न सका ,
दोस्त कहाँ था तुझे कभी , आज कुछ कर/कह न सका ;

मुसाफिर हूँ , शहर या बस्ती नहीं ,
तू साथ चल न सका , में पास रुक न सका ;

हर पते से पुछा है पता ,
किसी दरवाज़े पे खुद से मिल न सका ;

पीपल वो मेरा रूठ गया , सूख गया ,
ज़िन्दगी से बड़ा कोई रिश्ता जी न सका ;

हारा हो , माना है , पर जुर्म बस इतना है ,
तकदीर का अपना बस कभी हो न सका ;
-तुषार

...तनहा...

किससे अपना दिल कहे हर कोई हैरान फिरता है
भीड़ है कितनी दुनिया में , पर हर पल तनहा मिलता है
-तुषार

तन्हाई

क्या सोचा था ज़िन्दगी इतनी अजनबी होगी
चाँद मिलेगा फिर भी रात तनहा होगी

इंतज़ार तेरा ज़माने से बगावत होगा
तुझसे वफ़ा , खुदा से बेवफाई होगी

ज़िन्दगी मेरी मेरे हाथों में ही तो है
लकीरों में दास्ताँ हर पल की छुपी होगी

क़र्ज़ उठाये है मुस्कराहट के बेहिसाब
कभी तो नज़र कोई कहीं हमकदम होगी

मुख़्तसर से रिश्ते और फलसफे -ए -ज़िन्दगी ,
कारवां से मिले फिर भी तन्हाई संग होगी
-तुषार

...होंगे

जाम लिए हाथ मैं कहो न ए दिल,
लफ्ज़ वो तेरे भी अनसुने होंगे ;

दिलो का खेल है और दस्तूर एक ,
तेरी ज़मीन पर चंद अशक ही होंगे ;

न हो बेपर्दा और न ही किताब ,
कुछ दर्द बहे तो बस लुत्फ़ होंगे ;

दे इजाज़त मोहबत करने की मुझे ,
मेरे गुनाह कई फिर तुझे बक्शने होंगे ;

तू भी परख मुझे , और मैं भी , मालिक ,
कभी तो तेरे लिए हम भी इंसान होंगे ;
/*This is a stolen but felt thought */

दे गए आराम कुछ पल बैठ कर ,
और कितने दोस्ती के क़र्ज़ होंगे ;
-तुषार

Wednesday, January 20, 2010

...शाम...


दिन गया छोड़ मुझे यही ,
रात ने अभी अपनाया नहीं,
तनहा पर रहने दिया नहीं ,
हमसफ़र, शाम मुस्काई यही ...
-तुषार


Sunday, January 17, 2010

शिकवा ...


खवाब टूटने की खबर अजनबियों ने दी मुझे
ऐ ज़िन्दगी तूने इतना भी अपना न समझा मुझे

गेंरो ने सुना नहीं, कहानी अपनों से कह न सके
अश्क और लब बस अब जुड़वाँ लगते है मुझे

दर्द से उनके दर्द हुआ कम मेरा, आदम हूँ
क्यों हंसी , 'कबीर', सुकून दे न सकी मुझे

कई रिश्ते बस खामोश छोड़ दिए यूही
और कई जवाब कभी मिले न मुझे
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शिकवे और सवाल तो ज़िन्दगी को दिए मैंने
ज़िन्दगी ने तो बस 'ज़िन्दगी' दी है मुझे
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-तुषार

Tuesday, January 05, 2010

समर्पण ...


कोई उफान कोई तरंग नहीं
सब कुछ शांत सा हो गया है
कोई लगाव न ही कोई बिछोह
सब रात सा हो गया है
न न रात नहीं , वहां तो रोशनी है अँधेरे की
तो शायद होगा ये पतझड़ का सावन
वो भी नहीं
वोह भी तो मौसम है
है बस एक खालीपन , हाँ एक खालीपन
पर ..., पता नहीं
पर क्या महसूस होता है ?
कुछ भी नहीं , सूनापन भी नहीं
क्या सो गया है , यहाँ
जहाँ हकीकत सपनो से मिलती नहीं
और सपने हकीकत से उगते नहीं ...
यह बस शान्ति है ...
अपने को पाने की
और पा के बस जैसे
सब
समर्पित हो गया है ....
-तुषार

Friday, December 25, 2009

अक्स...

वो दर्द नहीं अगर वो जिया नहीं,
सिर्फ लफ्जों से अश्क नहीं रोते,
वो है हमारे ,तो क्या है नहीं वो ?
अक्स है, दिल में इन्सान नहीं सोते ।
-तुषार
PS: Time was running and I wanted to write something as an entry for December month, as only this year I have post for all months, now completed by 'Aks'. But I know this is just to fill December's blank , but what to do there were no real thoughts in December.

Friday, November 27, 2009

होंगे...

जाम लिए हाथ में न कहो ऐ दिल,
लफ्ज़ वो तेरे अनसुने होगे;

दिलो का खेल और दस्तूर एक,
तेरी ज़मीन पर चंद अश्क ही होगे;

न हो बेपर्दा और न ही किताब,
कुछ दर्द बहे तो बस लुत्फ़ होगे;

तू भी परख मुझे, और मैं भी, मालिक,
कभी तो तेरे लिए हम भी इंसान होगे;

दे गए आराम कुछ पल बैठ कर,
और कितने दोस्ती के क़र्ज़ होगे;
-तुषार