Friday, June 18, 2021

चलो कुछ लिख देते है ...

कहानी के पन्नो पर,
चलो कुछ लिख देते है ,
जो करते है महसूस ,
चलो  कुछ एहसास कह देते है। 

भूल जाते हैं कुछ समय के लिए ,
कौन पढ़ेगा  उन  पन्नो को ,
और  उन अपने लम्हो के लिए ,
चलो यादो को कलम कर देते है। 

बारिश के साथ जो बह गया,
जो ठहरे बादल सा रह गया,
कुछ चुरा लेते है उस काजल से ,
चलो स्याही उसे कर देते है। 

सफर के हमसफ़र सा,
थमे गुजरते दरख़्त की पत्तियों सा,
उन शाखों को पिरो लेते है ,
चलो चेहरों को शब्द नज़र कर देते है। 

वो जो था या नहीं था ,
हकीक़त और ख़्वाब के बीच कही था ,
कुछ उठा लेते है हकीक़त से,
चलो पुराने ख़्वाबों में नए रंग भर देते है। 

-कबीर (तुषार)

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लगे है !

मैं जब मुतासिर हो गया खुद से ही ,
देखो लोग सूरज से जलने लगे है !

वो अक्श था निहगों में गुलाब ही तरह ,
न जाने क्यों  काँटों से अश्र गिरने  लगे है !

ता उम्र मशरूफ़ रहा खुदा बनाने में उन्हें ,
वो काफ़िर आज जनाज़े में थकने लगे है !

हर कोई नाटक देखो कर रहा है यहाँ ,
अच्छे बुरे के दायरे मिटने लगे है !
-कबीर (तुषार)

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रहोगे ...

झूठ के कम्बल में यूँ ठिठुरते रहोगे ,
कह दोगे गर सच फिर भी जलते रहोगे !

एक दिन न कोई मान न कोई बेमान रहेगा ,
तुम कहानी पर अपनी ही हैरान रहोगे !

याद कर लो मौत को एक पल के लिए ,
जो जी रहे क्या वैसे ही जीते रहोगे ?

आसमाँ ले जायेगा उन सितारों के पास ,
कुछ लिख जाओगे या गुमनाम रहोगे !

मैं आज भी उनसे मिला कल की तरह,
तुम अब  मुझे मेहमानो में गिनते रहोगे !

-कबीर (तुषार)
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चोरी से मिल आता हूँ

मैं जब थक जाता हूँ ,
तो थोड़ा सो जाता हूँ ,

आँख बंद कर , चुपके से ;
अपने ही सपनो से देखो ,
चोरी से मिल आता हूँ 
-कबीर (तुषार)
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ज़िन्दगी तो नहीं !

कहने के लिए मिसरे दर-दर ढूंढता फिरता हूँ 
हो जाएगी मुक़मल ग़ज़ल ही है , ज़िन्दगी तो नहीं !

चलते चलते यूही थका लेता है खुद को नादान ,
क्या क्या खोने पर रोता है , बस अपनी मौत पे रोता नहीं !

जैसे देखता है खुदा को: प्यार से , डर से , बहाने से;
कायनात में बसी रूह उसकी देखता क्यों नहीं !

वो जाते जाते कुछ कह जाता, आखिरी यह एहसान कर जाता ?
उसकी ख़ामोशी के बोझ के साथ हँसता हूँ , रोया जाता नहीं !

-कबीर(तुषार)
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बदल...

एक नयी कभी पुरानी सी,
ढूंढता रहा हूँ उस तलाश को,
पाके उसे खुश था पल दो पल ,
फिर आँखों के कायदे गए बदल। 

देख लेता हूँ कभी कभी,
उन रुकी हुई तस्वीरों को,
जाने कैसे वो भी देखो  पीली हो गयी,
जैसे वक़्त के दामन गए बदल। 

पढ़ लेता हूँ आज भी,
उन खण्डरों की कहानी को,
लड़ रहे है शायद खुद से ही,
शहर और गाँव दोनों के आदमी गए बदल। 

ज़िन्दगी घड़ी बन रही है,
घंटो में बाँट दिया है हिस्सों को,
मशीन सा होता जा रहा हूँ ,
उन्मुक्ता के दायरे है गए बदल। 

-कबीर (तुषार)
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अलग...

न मानो बुरा कि, 
हँसता नहीं तुम्हारी बात पर मैं,
मानता हूँ हो मज़ाकिया तुम मियाँ  ,
पर शायद मेरे ज़ायके है अलग । 

न हो उदास देख कि,
मैं तन्हा हूँ नज़रो में ,
दूर हूँ अकेला नहीं,
मेरी तन्हाइयों के मायने है अलग। 

तुम कर लेते हो कैद 'शेर',
मैं कह लेता हूँ 'शेर',
कही दिल , कही दिमाग़ है,
हर किसी की ताक़त है अलग। 

सूरज है तो सितारे कही,
चाँद है तो सूरज नहीं ,
बैर नहीं कोई , गज़ब अंदाज़ है,
रात-दिन का आसमाँ है अलग। 

-कबीर (तुषार)
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रहा हूँ !

मैं था तो नहीं  चाँद,
फिर भी घटता बढ़ता रहा हूँ,
कभी उसके दुःख पर खुश,
कभी अपने एहसान भूलता रहा हूँ !

मैं था तो नहीं  वक़्त,
फिर भी देखो चलता रहा हूँ,
कभी काफिले रात में बांधता,
कभी अकेला सूरज सा पिघलता रहा हूँ !
 
मैं था तो नहीं  आवाज़,
फिर भी कहता सुनता रहा हूँ,
कभी सन्नाटे की फुसफुसाहट,
कभी शोर में चीखता रहा हूँ !

-कबीर (तुषार)
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प्रेम नगरिया श्याम बुलायो ...

प्रेम नगरिया श्याम बुलायो,
सांवरे रंग से नगर रँगायो ।
   
गोधूलि बेला बांसुरी मेला,
राधा को प्रेम बंधी  बनायो।   

मोर मुकुट, पीताम्बर खेला ,
गोकुल को मदहोश बनायो,

मोहनी मूरत, सांवरी सूरत ,
मीरा को देखो जोगन बनायो । 

कान्हा मेरा , जगत है तेरा ,
कुछ न खोया , उसे जो पायो। 
-कबीर (तुषार)

होने ...देते है!

बहुत उलझन है सीने में,
गलियो में कुछ चीखता रहता है,
कुछ थोड़ा अलग आज करते है ,
चलो चाँद को सोने देते है!

बहुत थकान है पैरो में,
बातों में ख़ामोशी बैठी है,
कुछ थोड़ा आज झुक जाते है 
चलो रात को गुजरने देते है!

बहुत लिखा है चेहरों पे,
लबो पे कहानी उलझी है,
कुछ हंसी के बादल तकते है 
चलो बारिश को बरसने देते है 

-कबीर (तुषार)
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श्याम बिना सूनी है सारी बतियाँ

कैसा है दिन और कैसी है रतियाँ, 
श्याम बिना सूनी है  सारी बतियाँ  || १ || 

जमुना किनारे देखो बैठी अकेली ,
आया न देखो, राह तकती रही सखियाँ  || २  || 

काला काजल काले-काले बादल,
बरसा मेघ बाजी न बाँसुरियाँ  || ३  || 

कौन गली जाऊँ कौन पहर बैठो,
न कोई गाँव कान्हा , न कोई डगरियाँ  || ४  || 

छोड़ गया मोहे , छूटा नहीं मोहसे,
राधा रोइ , मीरा बन गयी जोगनियाँ  || ५  || 

कैसा है दिन और कैसी है रतियाँ,
श्याम बिना सूनी है  सारी बतियाँ 

-कबीर (तुषार)
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अभी बाकी है !

तू  जाके भी नहीं गया ,
शायद कोई मौत अभी बाकी है ,
कितनी यादें कितनी उम्मीदें,
बहुत कुछ दफनाना अभी बाकी है !

दीवारों के रंग बदल दिए,
तस्वीरों  से आईने पोछ दिए,
जिस गली में ठहरे खड़े है,
उस गली से गुज़ारना अभी बाकी है !

बातों में वो जो चेहरे है,
गीतों से जुड़ी जो बातें है,
जो फ़क़त कभी लिखा नहीं ,
वो सब मिटाना अभी बाकी है !

वो जलते-२ भुझ भी गया,
आसमां सा वक़्त रुक भी गया,
बहुत कुछ धीरे-२  बहा दिया ,
बस राख बहानी  अभी बाकी है!

-कबीर (तुषार)
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एक इंसान हूँ मैं ?

विचित्रता के सत्य का एक प्रमाण हूँ मैं ,
खुदगर्ज़ समाज का पालक, एक इंसान हूँ मैं !

कैद कर रखी है कई जान पिंजरों में,
खुद की स्वतंत्रता के लिए चीखता रहा हूँ मैं !

कितना कुछ बटोर लिया छोड़ जाने के लिए,
आगे पीढ़ी के खाने में जहर घोलता रहा हूँ मैं !

जंगल से गाँव , गाँव से शहर ; लम्बा है सफर,
बर्फ पिघला, अपनी जीत की गर्मी में जल रहा हूँ मैं ! 

राशन तोलता , रिश्ते नापता; हर कुछ आँकता ,
आदम क्या , भगवान का  अनुक्रम रखता  रहा हूँ मैं !

-कबीर (तुषार)

ज़िन्दगी ...

बूँद बूँद कर गिरती रही भरती रही,
ज़िन्दगी पूरी भी हुई और खाली  भी रही !
-कबीर(तुषार) 

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गुमनामी

मैं ऐसे गुमनामी में मशहूर हो जाओ ,
अपने ही  किसी शेर को सुन दाद दे जाओ !
-कबीर (तुषार)

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ढल रहा ...

न चाँद आसमाँ है , न सूरज ढल रहा !
वक़्त रुका ज़माने से , ज़माना चल रहा !!

कितने मौसम साथ बीते साथ बिताये !
तेरी याद के पन्नो में मेरा ज़िक्र न रहा !!

मन सोचता नहीं, दिल कुछ कहता नहीं !!
कुछ खोया नहीं मैं बस खोया-खोया रहा !!

ढूंढता रहा उससे मंदिर-मस्जिद की भीड़ में !
वो जो बच्चों के साथ बाहर भूखा बैठा रहा !!

आज चार दीवारों में उन्मुक्ता से कैद हूँ !
सब से मिलके भी मेरा अपना यथार्थ रहा !!
-कबीर (तुषार )

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वादा...


दी थी जो  किताब , उसका उधार रह गया,
पन्नो में कैद था वादा, बस वादा ही रह गया !
-कबीर (तुषार)

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साँस ...चाँद ...

साँस-साँस कर देखो दिन गुज़र जाता है,
कुछ आह है होती  फिर चाँद बदल जाता है !
-कबीर (तुषार)

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वो साथ गुज़ारी शामों के ...

वो साथ गुज़ारी शामों के  ,
कुछ कदम तुमने रखे ,
कुछ राह मैंने थामी ,
वही थे पल , एक साथ गुजरे ,
कुछ याद तुमने चुनली ,
कुछ याद मैंने पाली ,
सालो बाद वही शाम है ,
कुछ लम्हे तुमको हँसाती ,
कुछ बातें हमको जगाती !
-कबीर (तुषार)

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सैलाब

खड़ा हूँ अकेला दरख़्त सा देखो,
कोई छू ले तो मैं भी सैलाब हो जाऊ !
-कबीर (तुषार)
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