Saturday, October 24, 2009
इंतज़ार ....
नाम लिखने के बाद ...
कुछ भी न लिख सका उस चेहरे की कर याद ...
खली ख़त ही भेज दिया जाने किस उम्मीद के साथ ...
हर जवाब तुम हो ...आज भी है इंतज़ार ...
-कबीर का दोस्त
ऐसे ही ...एक ख्याल
तमन्ना ....
कहीं बस ख्याल उनका कुछ गुदगुदा जाता है
वो कहे न कहे कुछ हमसे , तो क्या ?
किसी तमन्ना से दिल फिर भी मुस्कुरा जाता है...
-तुषार
परख ...
पर कब तक बस उनके लिए
परख उनको भी ऐ मेरे मालिक
बख्श उन्हें भी हँसी मेरी
-तुषार
Monday, September 28, 2009
bye bye Jerry
With a smile and wet eyes
Loads of wishes few said
Lot of feeling left unsaid
For wonderful journey you have
For a life you want to carve
For moments to be unfolded
For new stature to be molded
I would not say, no byes
There will be no wet eyes
Just a sweet little smile
As you head to new mile
No parting gift no farewell game
Just a promise, as I add a name
Into my life, a relation not to wane
You will live in life’s memory lane
Why we say good byes?
With smile with wet eyes
For wonderful journey you have
For a life you want to carve…
-Tushar
PS: I posted it almost after a year. Jerry left Aricent in Oct 2008
Saturday, September 26, 2009
what if ...
‘अगर’ यह हो तो बस होगा क्या ?
पर उसी का अंत होता है एक ‘मगर’,
मगर उन सपनो से ज़िन्दगी चलती है क्या ?
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Every dream starts with “what if”
“what if “ it gets a form of being real
And then it concludes into being real
A reality that leaves only the “what if “ …
-Tushar
अगर...मगर...
जहाँ में ‘मगर ’ होगे बहूत ;
वो साथ तो होगे हर वक्त,
तनहा पल फिर भी होगे बहूत;
कहीं कोहरे को बदल समझ बैठे,
बहना चाहते थे साथ हम भी ‘मगर’;
छट गई धुंध और खड़े रह गए दरख्त,
सालो से जैसे किसी का इंतज़ार हो बहूत ;
जिंदगी खड़ी थी उस मोड़ पर वहां,
रास्ता सीधा पहूचता था ‘मगर’,
एक काफिर ने राह यूँ मोड़ दी है कि ,
मंजिल नज़र से दूर हुई है बहूत;
अपने होने का सबब पूछ बैठा आंसू,
कह न पाए हम उस लगी को ‘मगर’,
बहा है अपने ही लहू से वो भी,
दर्द भी है, और खुशी भी बहूत;
-तुषार
Tuesday, September 22, 2009
रात...
कुछ अज़ब सा ठहराव,
कुछ रुकी खामोशी,
कुछ बस बहता अँधेरा ;
कुछ ऐसा है रात का आगोश ,
जैसे बस कोई ख्याल हों फैला ,
हर कुछ जैसे बस खो सा गया है ,
बस एक रंग में सर्द राख सा बना ;
इसी ठहराव में चलता है कोई,
इसी खामोशी में होती है कुछ बातें ,
इसी अंधेरे से मिलता है वो उजाला ,
जहाँ मिलता हूँ मैं
मुझसे
मेरे सपनो में...
-तुषार
पलछिन
सवारते रहते है लिबास कई ;
अनजान कोई हर सुबह मिलता है !
वो सडको पे बरसता है ,
रात में थके साए कई ;
चाँद तो दिन मैं सोता है !
कहीं कोई रुक गया है झरना ,
मोती फिर भी मिलते है वही ;
क्या कोई हार टूटा है !
किताब की धूल झाड़ दी हमने ,
नए फूल गुलदस्ते में सही;
क्या यादो को कबाडी लेता है !
रात में तनहा नहीं, दिन में है ,
कहो मिजाज़ यह क्या कहता है ;
रोशन तारे है , पर टिमटिमाते ही है !
-तुषार
याद..
ना बीते पल, ना गुजरे लम्हे
क्या यादो को बक्से में बंद कर दिया है
या कुछ यादगार था ही नहीं ...
-तुषार
Sunday, August 30, 2009
...दो
अगर खवाब है तो खवाब ही रहने दो,
जितनी मिलती है ज़िन्दगी, उससे मुझे मिलने दो ।
जाग कर भी अगर ना मिल सको तुमसे ,
मुझे मेरे फरिस्ते फिर बस सोने दो ।
रेत का एक ज़ज्बात है खड़ा साहिल पर ,
लहरों में डूब उसे भी मोती बनने दो ।
एक चाँद ने अकेले कई रात यू काटी है ,
अब तो 'कबिर' उसे भी एक सितारा होने दो ।
चला है साथ ज़माने से ज़माने तक,
शाम के संग उसे यूँ बेबाक आजाद मत होने दो ।
Tuesday, August 04, 2009
... Tired...
Can’t see anything coming, forgotten all gone;
My mind is not awake, my body doesn’t sleep,
Tired of promises that I had and have to keep;
I work for days and days to reach there,
But the map seems to be left somewhere;
I am tired of being alive as fellow dead,
One who missed all to earn daily his bread;
I am tired of the love and hate by all,
Which is always lost to tears at nightfall … -Tushar
Thursday, July 23, 2009
...देता हूँ
सब के लिए ख़ुद को भूला देता हूँ;
ज़र्रे-ज़र्रे बूटे में ढूँढा किए दिल,
तुझे अपने नाम की वजह देता हूँ;
वो भागते भूल गए चाँद से मिलना,
ए मुसाफिर तुझे तारो के रात देता हूँ;
मिल गए कभी जुदा हुए ए 'कबीर'
सपनो की कुछ ऐसे सच्चाई देता हूँ;
गिला नहीं, ढूँढा नहीं तुझे ए खुदा,
मालिक तुझे माँ का नाम देता हूँ;
राहगीर चलते गए, तलाश में कोई,
तुझे तेरा सा रहगुज़र देता हूँ;
-तुषार
Sunday, July 19, 2009
I will fight destiny’s odds...
Of rain on my window-step
I will fight destiny’s odds
untill sunshine smiles at my doorstep
I have woken through past nights
Eager to embrace, as a friend, the day
I will fight destiny’s odds
Till moonlight and love are my pay
I have walked under sunny ways
Watched the grass turn to hay
I will fight the destiny’s odds
Till I get the promised pastures and sun-kissed bays
I have woven dreams in the clouds
Watched the white vows turn grey
I will fight destiny’s odds
Till life-perfect I have, I would say
-Tushar, edited by Nilanjan
Wednesday, July 08, 2009
ज़िन्दगी ...?
वो बहा नहीं, तो क्या उसका कोई नाम नहीं ?
वो लकीरें है हाथो में और कुछ भी तो नहीं ,
वो जिन्दगी, कहीं मौत का एक अंदाज़ तो नहीं ?
-कबीर
Friday, June 12, 2009
...खुशी...गम...
वो खुशी तेरी थी, तेरी हुई, चली गई,
वो अशक मेरे थे, बहे फिर ठहर गए;
अब क्यों खुशी को बुलाये जो हुई पराई?
क्यों गम को सताए जो है बस हमसाये ?
-तुषार
Wednesday, June 10, 2009
...गम...दिल ...
तू गया, तेरा गम भी एक दिन यूँ चला जाएगा,
कोई कहाँ रुका है जो यह मौसम ठहर जाएगा
वो बरसा तो दिल भी कहीं गीला भीगा हो जाएगा
वो सूख गया तो दिल भी बस पत्थर हो जाएगा .
-तुषार
Wednesday, June 03, 2009
ये रात अकेली लगती है ...
वो चाँद तन्हा जगता है ;
न कोई अपना मिलता है ,
न कोई पराया दीखता है ;
वो दिन मैं चेहरे लड़ते है ,
और रात में डर सा लगता है ;
वो कहीं बिछडा जाता है ,
यह हाथ खाली रहता है ;
वो ऊचे मकान में जीता है ,
कहीं घर खाली बैठा है ;
यह आसमान को छुता है ,
बस तारो से बातें करता है ;
वो सर्द ईमारत में हँसता है ,
मौसम से अछुता रहता है ;
वोह दिनभर भागता रहता है ,
और बस इंतज़ार में जीता है ;
वो रोज़ कुछ पाता है ,
और ख़ुद खोता लगता है ;
कहाँ अब ख़ुद से मिलता है ,
कहाँ ख़ुद को जानता है ;
कुछ अधूरे सपनो को रोता है ,
और ज़िन्दगी से शिकायत करता है ;
ये रात अकेली लगती है ,
वो चाँद तन्हा जगता है ;
-तुषार
Monday, June 01, 2009
अन्त ...शुरुवात...
वही शुरुवात जो उस अन्त के लिए जन्मी थी ...
Every end is a conclusion of a new start,
The start which commenced for that very end…
-Tushar